Wednesday, August 4, 2010

Happy Birthday, Kishore Saab!!!

I’ve never seen God. Or heard His voice. I’ve heard Kishore saab signing; that’s as close as I have gotten.

I challenge another human, or for that matter mechanized, throat to sing Koi Humdum Na Raha the way the man sang it. How can a voice sound the same in all three octaves? I wouldn’t be surprised if someone told me that his voice box was not earthly.

Had it not been for Kishore saab, I would have thought of the concept of someone’s voice touching the heart as being a hyperbole.

I do not wish to write much in this post for two reasons: 1) Those who understand what he iwas don’t need to read anything more about him; those who don’t, don’t deserve to. 2) I might use up all the server space of Blogger.com writing about Kishore saab and his songs.

All I can say is that I love you, Kishore saab! I would’ve given up anything to be able to meet you, but you left us when I was six. Hope to meet you on the other side when I get there.
I'll quote Ghalib and end this post, even as tiny droplets form in my eyes. This is for you, Kishore saab:

लाज़िम था कि देखो मेरा रस्ता कोई दिन और
तन्हा गए क्यूँ अब रहो तन्हा कोई दिन और


जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे
क्या ख़ूब क़यामत का है गोया कोई दिन और


Update: I just realized that it would be more appropriate to quote the above couplets on the fateful day of October 13. But I'll keep them in the post because they came out spontaneously and because I'm missing Kishore saab terribly :(

8 comments:

Laxmi Salgaonkar said...

:)

Mohit said...

@ Laxmi Tai: I love him as much as I love you.

yogesh said...

We all know how much you love kishore saab !!!!!

Mohit said...

Ya I guess so, Yogesh, what with the blog post about how I saved a girl's life :)

Parikshit said...

good one again! how about bhavre ki gunjan......?

Mohit said...

Oh yeah, Bhanwre ki Gunjan is another classic! Glad you mentioned it here. The way he pronounces the word "Gunjan" is incredible :)

रौशन् कामत् said...

कोई हम्‌दम् न रहा? हँ ...
"कोई होता जिस्‌को अप्ना हम् अप्ना कॆह् लेते यारो" या फिर् "कोई लौटा दे मेरे बाते हूए दिन्" के बारे मेँ क्या ख़याल् है ?
ग़रज़् कि पह्‌ले वाले किशोर् दा मेँ वॊः ऽअजब् सोज्-ओ गुदाज़्-ओ दर्द् था जो कि १९७० के बऽद् न रहा । तऽज्जुब् की बात् यॆः है कि किशोर् दा की शॊह्‌रत् का सितारः उभ्‌रा भी तो "कटी पतंग्" के बऽद् ! वॊः क्या कह्‌ते है अंग्रेज़ी मेँ "The lord works in mysterious ways".

Mohit said...

रौशन साहब, अपनी टिपण्णी मेरे ब्लाग पर दर्ज़ करने के लिए शुक्रिया. जिन गानों के बारे में आपने बात की, वो गाने भी मुझे बड़े पसंद हैं, हालां कि "कोई लौटा दे" सुने हुए मुझे काफ़ी वक़्त बीत चूका है. पुराने पिकचरों के बारे में ज़्यादा जानकारी न होने के कारण (जैसे कि वो किस साल में आए थे) मैं आपकी १९७० के पहले वाले गाने और उसके बाद वाले गाने इसके के बारे में बात के उत्तर में कुछ कह नहीं पाऊँगा. मैं बस इतना कह सकता हूँ कि मैं किशोर साहब के गानों को बहुत पसंद करता हूँ, और उनके जैसा गायक (जहां तक प्लेबैक का सवाल है) मैंने आज तक देखा नहीं. लता जी यक़ीनन मैंने सुने हुए गायकों में से तकनीकी तौर पे सर्वश्रेष्ठ गायिका हैं. मगर जो impact किशोर साहब के गानों में मुझे महसूस होता है वो मुझे किसी और के गानों में महसूस नहीं होता.